श्री राधा कृपा कटाक्ष स्त्रोत्र Lyrics in Hindi with meaning

श्री राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र भगवान शिव द्वारा रचित एक कालातीत स्तुति है, जो श्री राधा की महिमा का गान करती है। श्री राधा दिव्य करुणा की साक्षात् मूर्ति हैं। कहा जाता है कि यह स्तोत्र कठोर से कठोर कर्मों को भी पिघला देता है और हृदय को शुद्ध भक्ति के लिए खोल देता है।

इस वीडियो में संपूर्ण स्तोत्र मूल संस्कृत श्लोकों तथा उनके हिन्दी अर्थ सहित प्रस्तुत किया गया है। यदि आप श्री राधा और भगवान विष्णु की कृपा से आकर्षित हैं, तो यह स्तोत्र आपके अंतर-जगत को रूपांतरित करने की शक्ति रखता है।

श्री राधा कृपा कटाक्ष का नित्य पाठ क्यों करें?

• श्री राधा की करुणामयी दृष्टि को प्राप्त करने हेतु, जिसे समस्त लोकों में सर्वोच्च आशीर्वाद माना गया है।
• हृदय को कोमल बनाने और संचित कर्मों का क्षय करने के लिए।
• श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति को दृढ़ और गहन करने के लिए।

प्रतिदिन केवल कुछ मिनटों का गान भी आपके आंतरिक भाव को बदल सकता है।
श्री राधा की मन को स्थिर करने वाली, शांति प्रदान करने वाली कृपा सभी श्रोताओं को स्पर्श करे। 

मुनीन्द्र–वृन्द–वन्दिते त्रिलोक–शोक–हारिणि
प्रसन्न-वक्त्र-पण्कजे निकुञ्ज-भू-विलासिनि
व्रजेन्द्र–भानु–नन्दिनि व्रजेन्द्र–सूनु–संगते
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥१॥

समस्त मुनिगण आपके चरणों की वंदना करते हैं, आप तीनों लोकों का शोक दूर करने वाली हैं, आप प्रसन्नचित्त प्रफुल्लित मुख कमल वाली हैं, आप धरा पर निकुंज में विलास करने वाली हैं। आप राजा वृषभानु की राजकुमारी हैं, आप ब्रजराज नन्द किशोर श्री कृष्ण की चिरसंगिनी है, हे जग जननी श्रीराधे माँ ! आप मुझे अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ कब करोगी ?

अशोक–वृक्ष–वल्लरी वितान–मण्डप–स्थिते
प्रवालज्वाल–पल्लव प्रभारुणांघ्रि–कोमले ।
वराभय-स्फुरत्करे प्रभूत-सम्पदालये
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥२॥

आप अशोक की वृक्ष-लताओं से बने हुए मंदिर में विराजमान हैं, आप सूर्य की प्रचंड अग्नि की लाल ज्वालाओं के समान कोमल चरणों वाली हैं, आप भक्तों को अभीष्ट वरदान, अभय दान देने के लिए सदैव उत्सुक रहने वाली हैं। आप के हाथ सुन्दर कमल के समान हैं, आप अपार ऐश्वर्य की भंडार स्वामिनी हैं, हे सर्वेश्वरी माँ ! आप कब मुझे अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ?

अनङ्ग-रण्ग मङ्गल-प्रसङ्ग-भङ्गुर-भ्रुवां
सविभ्रमं ससम्भ्रमं दृगन्त–बाणपातनैः ।
निरन्तरं वशीकृत-प्रतीत-नन्द-नन्दने
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥३॥

रास क्रीड़ा के रंगमंच पर मंगलमय प्रसंग में आप अपनी बाँकी भृकुटी से आश्चर्य उत्पन्न करते हुए सहज कटाक्ष रूपी वाणों की वर्षा करती रहती हैं। श्री नन्दकिशोर को निरंतर आप अपने बस में किये रहती हैं, हे जगजननी वृन्दावनेश्वरी माँ ! आप कब मुझे अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ?

तडित्–सुवर्ण–चम्पक –प्रदीप्त–गौर–विग्रहे
मुख–प्रभा–परास्त–कोटि–शारदेन्दुमण्डले ।
विचित्र-चित्र सञ्चरच्चकोर-शाव-लोचने
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥४॥

आप बिजली के सदृश, स्वर्ण तथा चम्पा के पुष्प के समान सुनहरी आभा वाली हैं, आप दीपक के समान गोरे अंगों वाली हैं, आप अपने मुखारविंद की चाँदनी द्वारा शरद पूर्णिमा के करोड़ों चन्द्रमा को लजाने वाली हैं। आपके नेत्र पल-पल में विचित्र चित्रों की छटा दिखाने वाले चंचल चकोर शिशु के समान हैं, हे वृन्दावनेश्वरी माँ ! आप कब मुझे अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ?

मदोन्मदाति–यौवने प्रमोद–मान–मण्डिते
प्रियानुराग–रञ्जिते कला–विलास–पण्डिते ।
अनन्य-धन्य–कुंजराज–कामकेलि–कोविदे
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥५॥

आप अपने चिर-यौवन के आनन्द के मग्न रहने वाली है, आनंद से पूरित मन ही आपका सर्वोत्तम आभूषण है, आप अपने प्रियतम के अनुराग में रंगी हुई विलासपूर्ण कला पारंगत हैं। आप अपने अनन्य भक्त गोपिकाओं से धन्य हुए निकुंज-राज के प्रेम क्रीड़ा की विधा में प्रवीण हैं, हे निकुँजेश्वरी माँ ! आप कब मुझे अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ?

अशेष–हावभाव–धीरहीर-हार–भूषिते
प्रभूतशातकुम्भ–कुम्भकुम्भि–कुम्भसुस्तनि ।
प्रशस्तमन्द–हास्यचूर्ण पूर्ण-सौख्य–सागरे
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥६॥

आप संपूर्ण हाव-भाव रूपी श्रृंगारों से परिपूर्ण हैं, आप धीरज रूपी हीरों के हारों से विभूषित हैं, आप शुद्ध स्वर्ण के कलशों के समान अंगो वाली है, आपके पयोंधर स्वर्ण कलशों के समान मनोहर हैं। आपकी मंद-मंद मधुर मुस्कान सागर के जैसे आनन्द प्रदान करने वाली है, हे कृष्णप्रिया माँ ! आप कब मुझे अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ?

मृणाल-वाल-वल्लरी तरङ्ग-रङ्ग-दोर्लते
लताग्र–लास्य–लोल–नील–लोचनावलोकने ।
ललल्लु-लन्मिलन्मनोज्ञ–मुग्ध–मोहिनाश्रिते
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥७॥

जल की लहरों से कम्पित हुए नूतन कमल-नाल के समान आपकी सुकोमल भुजाएँ हैं, आपके नीले चंचल नेत्र पवन के झोंकों से नाचते हुए लता के अग्र-भाग के समान अवलोकन करने वाले हैं। सभी के मन को ललचाने वाले, लुभाने वाले मोहन आप पर मुग्ध होकर आपके मिलन हेतु आतुर रहते हैं आप ऐसे मनमोहन को आश्रय देने वाली हैं, हे वृषभानुनन्दनी माँ ! आप कब मुझे अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ?

सुवर्णमलिकाञ्चिते–त्रिरेख–कम्बु–कण्ठगे
त्रिसूत्र–मङ्गली-गुण–त्रिरत्न-दीप्ति–दीधिते ।
सलोल–नीलकुन्तलले–प्रसून–गुच्छ–गुम्फिते
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥८॥

आप स्वर्ण की मालाओं से विभूषित है, आप तीन रेखाओं युक्त शंख के समान सुन्दर कण्ठ वाली हैं, आपने अपने कण्ठ में प्रकृति के तीनों गुणों का मंगलसूत्र धारण किया हुआ है, इन तीनों रत्नों से युक्त मंगलसूत्र समस्त संसार को प्रकाशमान करता है। आपके काले घुंघराले केश दिव्य पुष्पों के गुच्छों द्वारा अलंकृत हैं, हे कीरतिनन्दनी माँ ! आप कब मुझे अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी।

नितम्ब–बिम्ब–लम्बमान–पुष्पमेखलागुणे
प्रशस्तरत्न-किङ्किणी-कलाप-मध्य मञ्जुले ।
करीन्द्र–शुण्डदण्डिका–वरोहसौभगोरुके
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥९॥

हे देवी, तुम अपने घुमावदार कूल्हों पर फूलों से बनी कमरबंद धारण करती हो, तुम झिलमिलाती हुई घंटियों जैसी सुन्दर कमरबंद के साथ बहुत ही मोहक लगती हो, तुम्हारी सुंदर जांघें राजसी हाथी की सूंड को लज्जित करती हैं, हे देवी! तुम कब मुझ पर अपनी कृपा कटाक्ष (दृष्टि) डालोगी?

अनेक–मन्त्रनाद–मञ्जु नूपुरारव–स्खलत्
समाज–राजहंस–वंश–निक्वणाति–गौरवे ।
विलोलहेम–वल्लरी–विडम्बिचारु–चङ्क्रमे
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥१०॥

आपके चरणों में स्वर्ण मण्डित नूपुर की सुमधुर ध्वनि अनेकों वेद मंत्रो के समान गुंजायमान करने वाले हैं, जैसे मनोहर राजहसों की ध्वनि गूँजायमान हो रही है। आपके अंगों की छवि चलते हुए ऐसी प्रतीत होती है जैसे स्वर्णलता लहरा रही हो, हे जगदीश्वरी माँ! आप कब मुझे अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ?

अनन्त–कोटि–विष्णुलोक–नम्र–पद्मजार्चिते
हिमाद्रिजा–पुलोमजा–विरिञ्चजा-वरप्रदे ।
अपार–सिद्धि–ऋद्धि–दिग्ध–सत्पदाङ्गुली-नखे
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥११॥

अनंत कोटि बैकुंठो की स्वामिनी श्रीलक्ष्मी जी आपकी पूजा करती हैं, श्री पार्वती जी, इन्द्राणी जी और सरस्वती जी ने भी आपकी चरण वन्दना कर वरदान पाया है। राधा जी के चरण- कमलों की एक उंगली के नाख़ून मात्र का स्मरण करने से अपार सिद्धि की प्राप्ति हो जाती है, हे करूणामयी माँ ! आप कब मुझे अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ?

मखेश्वरि क्रियेश्वरि स्वधेश्वरि सुरेश्वरि
त्रिवेद–भारतीश्वरि प्रमाण–शासनेश्वरि ।
रमेश्वरि क्षमेश्वरि प्रमोद–काननेश्वरि
व्रजेश्वरि व्रजाधिपे श्रीराधिके नमोस्तुते ॥१२॥

आप समस्त प्रकार के यज्ञों की स्वामिनी हैं, आप संपूर्ण क्रियाओं की स्वामिनी हैं, आप स्वधा देवी की स्वामिनी हैं, आप समस्त देवताओं की स्वामिनी हैं, तीनों वेदों की आप स्वामिनी है, संपूर्ण जगत पर आप शासन करने वाली हैं। आप रमा देवी की स्वामिनी हैं,आप क्षमा देवी की भी स्वामिनी हैं, आप आमोद-प्रमोद की स्वामिनी हैं, हे ब्रजेश्वरी ! हे ब्रज की अधीष्ठात्री देवी श्रीराधिके! आपको मेरा बारंबार नमन है।

इती ममद्भुतं-स्तवं निशम्य भानुनन्दिनी
करोतु सन्ततं जनं कृपाकटाक्ष-भाजनम् ।
भवेत्तदैव सञ्चित त्रिरूप–कर्म नाशनं
लभेत्तदा व्रजेन्द्र–सूनु–मण्डल–प्रवेशनम् ॥१३॥

हे वृषभानु नंदिनी! मेरी इस निर्मल स्तुति को सुनकर सदैव के लिए मुझ दास को अपनी दया दृष्टि से कृतार्थ करने की कृपा करो। केवल आपकी दया से ही मेरे प्रारब्ध कर्मों, संचित कर्मों और क्रियामाण कर्मों का नाश हो सकेगा, आपकी कृपा से ही भगवान श्रीकृष्ण के नित्य दिव्यधाम की लीलाओं में सदा के लिए प्रवेश हो जाएगा।

राकायां च सिताष्टम्यां दशम्यां च विशुद्धधीः ।
एकादश्यां त्रयोदश्यां यः पठेत्साधकः सुधीः ॥१४॥

यं यं कामयते कामं तं तमाप्नोति साधकः ।
राधाकृपाकटाक्षेण भक्तिःस्यात् प्रेमलक्षणा ॥१५॥

यदि कोई साधक पूर्णिमा, शुक्ल पक्ष की अष्टमी, दशमी, एकादशी और त्रयोदशी के रूप में जाने जाने वाले चंद्र दिवसों पर स्थिर मन से इस स्तवन का पाठ करे तो। साधक की समस्त मनोकामना पूर्ण हो जाये और श्री राधा जी की दयालु पार्श्व दृष्टि से वे सभी भक्ति सेवा की प्राप्ति करें, जिसमें भगवान के शुद्ध, परमानंद प्रेम के विशेष गुण हैं।

ऊरुदघ्ने नाभिदघ्ने हृद्दघ्ने कण्ठदघ्नके ।
राधाकुण्डजले स्थिता यः पठेत् साधकः शतम् ॥१६॥

तस्य सर्वार्थ सिद्धिः स्याद् वाक्सामर्थ्यं तथा लभेत् ।
ऐश्वर्यं च लभेत् साक्षाद्दृशा पश्यति राधिकाम् ॥१७॥

जो साधक श्री राधा-कुंड के जल में खड़े होकर (अपनी जाँघों, नाभि, छाती या गर्दन तक) इस स्तम्भ (स्तोत्र) का १०० बार पाठ करे। वह जीवन के पाँच लक्ष्यों धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष और प्रेम में पूर्णता प्राप्त करे, उसे सिद्धि प्राप्त हो। उसकी वाणी सामर्थ्यवान हो (उसके मुख से कही बातें व्यर्थ न जाए ) उसे श्री राधिका जी को अपने सम्मुख देखने का ऐश्वर्य प्राप्त हो और।

तेन स तत्क्षणादेव तुष्टा दत्ते महावरम् ।
येन पश्यति नेत्राभ्यां तत् प्रियं श्यामसुन्दरम् ॥१८॥

अर्थात – अपने भक्त पर प्रसन्न होकर श्री राधिका जी उसे महान वर प्रदान करें कि वह स्वयं अपने नेत्रों से उनके प्रिय श्यामसुंदर को देखने का सौभाग्य प्राप्त कर सकें।

नित्यलीला–प्रवेशं च ददाति श्री-व्रजाधिपः ।
अतः परतरं प्रार्थ्यं वैष्णवस्य न विद्यते ॥१९॥

अर्थात – वृंदावन के स्वामी, उस भक्त को अपनी शाश्वत लीलाओं में प्रवेश दें। वैष्णव लोग इससे आगे किसी चीज की लालसा नहीं रखते।

॥ इति श्रीमदूर्ध्वाम्नाये श्रीराधिकायाः कृपाकटाक्षस्तोत्रं सम्पूर्णम ॥