Kaun Kutil Khalkami by Surdas ji with Lyrics and meaning | कौन कुटिल खल कामी।

यह भजन सूरदास जी द्वारा रचित है, जिसमें वे जीवन की मोह-माया और पाप के बारे में चेतावनी देते हैं। सूरदास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने शरीर को मोह के कारण पापों में लिप्त करता है, वह अंततः नष्ट हो जाता है। वे इस भजन में यह भी कहते हैं कि वह कौन व्यक्ति है जो पाप और बुराई से बचकर भगवान के भक्ति मार्ग पर नहीं चलता। वे यह समझाने की कोशिश करते हैं कि पाप और बुरे कर्मों से कोई नहीं बच सकता, सिवाय भगवान के आशीर्वाद के। सूरदास जी का संदेश है कि हर व्यक्ति को भगवान की भक्ति में रत होना चाहिए, क्योंकि भगवान ही इस संसार में सबसे उच्च और शुद्ध हैं।

मो सम कौन कुटिल खल कामी।
जेहिं तनु दियौ ताहिं बिसरायौ, ऐसौ नोनहरामी॥
भरि भरि उदर विषय कों धावौं, जैसे सूकर ग्रामी।
हरिजन छांड़ि हरी-विमुखन की निसदिन करत गुलामी॥
पापी कौन बड़ो है मोतें, सब पतितन में नामी।
सूर, पतित कों ठौर कहां है, सुनिए श्रीपति स्वामी॥

मो सम कौन कुटिल खल कामी।
"Who is as wicked and sinful as I am?
In this, the poet (Surdas ji) is lamenting that he has lost sight of the divine, the true giver of life and body, and has become lost in worldly distractions. The verse conveys a sense of regret and realization about being ungrateful for the divine gift of life and the purpose that comes with it. The speaker acknowledges his own deceitful nature in turning away from the divine source.

“मुझसे अधिक कुटिल और पापी कौन है?”
यहां कवि (सूरदास जी) यह अफसोस जता रहे हैं कि उन्होंने ईश्वर, जो जीवन और शरीर के वास्तविक दाता हैं, को भुला दिया है और सांसारिक वासनाओं में उलझकर अपना मार्ग खो दिया है। यह शेर एक गहरी पछतावे और आत्म-चेतना का अहसास कराता है, जिसमें कवि ईश्वर के दिए गए जीवन और उसके उद्देश्य के प्रति अपनी अज्ञता और कृतघ्नता को स्वीकार करते हैं। कवि अपनी धोखाधड़ी और ईश्वर से विमुख होने के कारण को भी स्वीकार करते हैं।

जेहिं तनु दियौ ताहिं बिसरायौ, ऐसौ नोनहरामी॥

The body that was graciously bestowed upon me, I have forgotten its giver; such is the deceitful I have been.”
The line expresses regret and self-awareness, where the speaker (Surdas) acknowledges that he has forgotten the divine giver of life (God) and has been deceitful by neglecting the purpose of life.

“जिस देह को उसने कृपा से दिया, मैं ने उसके दाता को भुला दिया; ऐसा धोखा मैंने खुद से किया है।”

यह पंक्ति पछतावे और आत्मचेतना को व्यक्त करती है, जिसमें सूरदास जी स्वीकार करते हैं कि उन्होंने जीवन के दाता (ईश्वर) को भुला दिया और जीवन के उद्देश्य को नकारते हुए धोखाधड़ी की है।

भरि भरि उदर विषय कों धावौं, जैसे सूकर ग्रामी।
“I fill my belly with worldly desires, just like a pig running after filth.”
“भर-भर कर उदर में विषयों को समेटता हूँ, जैसे सूकर गंदगी की ओर दौड़ता है।”

This reflects the intense metaphor used by Surdas, comparing the pursuit of worldly desires to a pig wallowing in filth. It emphasizes the futility and degradation of such actions.

हरिजन छांड़ि हरी-विमुखन की निसदिन करत गुलामी॥

“I abandon the company of the pious and serve those who are turned away from the Lord, day and night.”
“हरिजन का साथ छोड़कर, हरी-विमुखों की निसदिन करता हूँ गुलामी।”

This reflects the speaker’s regret and sorrow for choosing the path of associating with those who are distant from divine grace, instead of walking the righteous path with the pious.

पापी कौन बड़ो है मोतें, सब पतितन में नामी।

“Who is a greater sinner than me? Among all the fallen ones, I am the most notorious.”
“पापी कौन है मुझसे बड़ा, मैं तो सब पतितों में प्रसिद्ध हूँ।”

This reflects the speaker’s deep self-awareness of his own flaws and sins, feeling as though he is the most sinful among all those who have strayed from the righteous path.


सूर, पतित कों ठौर कहां है, सुनिए श्रीपति स्वामी॥

“Sūrdas says, where is the refuge for such a fallen soul? Listen to me, O Lord, the master of all.”
“सूर, पतित को ठौर कहाँ है, सुनिए श्रीपति स्वामी।”

This line expresses the speaker’s despair and plea for divine intervention. He questions where a fallen soul like him can find solace and turns to the Lord, seeking refuge and grace. It reflects both humility and deep yearning for redemption.

सूरदास 16वीं शताब्दी के प्रसिद्ध भारतीय संत, कवि, और भक्ति आंदोलन के महान लेखक थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के भदोई जिले के सिरपुर गांव में हुआ था, और वे भगवान श्री कृष्ण के भक्त थे। सूरदास की कविताओं और भजनों में कृष्ण भगवान के साथ उनकी गहरी श्रद्धा और प्रेम को व्यक्त किया गया है।

वे हिन्दी साहित्य के एक महान कवि माने जाते हैं और विशेष रूप से उनकी रचनाएँ भक्तिरस से ओतप्रोत होती हैं। सूरदास के भजन और कविताएँ आज भी भारतीय संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। उनका प्रमुख कार्य “सूरसागर” है, जो भगवान श्री कृष्ण के जीवन और लीलाओं का विस्तार से वर्णन करता है।

सूरदास की कविताएँ सरल, भावपूर्ण और गहरे आध्यात्मिक अनुभवों से परिपूर्ण होती थीं, और उन्होंने भगवान के प्रति प्रेम को सर्वोत्तम रूप में व्यक्त किया। उनके भजन आज भी गाए जाते हैं और उन्हें भारतीय संगीत और साहित्य में अहम स्थान प्राप्त है।